Amaya...Ek maa ki maya,

खुले आसमान में बेख़ौफ़ ,आज़ाद उड़ती हुई पतंग की जब डोर कटती है और जिस तरह वह जमीन पर पड़ी मिलती है ठीक उसी तरह आज अमाया अपने स्वीमिंग पूल के पास अपनी पसंदीदा कुर्सी और अपने पसंदीदा Scotch के साथ चाँद को निहारती ऐसे,..... जैसे अपने ज़िंदगी की आखिरी पल को गुज़रते देख रही हो...... 

                                           समय तो रात का है पर इतना अँधेरा भी नहीं, की कोई उसके चेहरे की बेज़ारी को पढ़ न सके और उसके टूटने का दर्द उसके आँखों में देख न सके !!
Mom.... mom .....  आवाज लगाती हुई माया,.....वहाँ आती है और अमाया के पास बैठती है ,उसके बिखरे हुए बालों को सवारती हुई माया, फिर कहती है...... Mom,
तभी अमाया उसके हाथों पर अपना हाथ रख उसे रोकती है !!

अमाया - किसी का प्यार पाना इस दुनियाँ में इतना मुश्किल क्यों होता है ? माँ की शक़्ल देखी नही और पिता का प्यार कभी दिखा नही........ सारा बचपन इसी कोशिश में बीता,प्यार न सही कम से कम पापा मुझे अपनी संतान तो माने, मगर उनका प्यार मेरे साथ जन्में पलभर के भाई के साथ इतना गहरा था की उनको मेरा प्यार कभी दिखा नहीं और न चाहते हुए भी उसके न होने की वजह, मैं बन गई और मेरे हाथ से मेरे सारे रिश्ते पल भर में छूट चुके थे, अब हमारे बीच सिर्फ कभी न मिटने वाली नफरत बची थी  !!
                    माया का हाथ थामे खुले आसमां की ओर देखती अमाया....... उसकी कापती आवाज से लग रहा था बरसों से दबे उसके दर्द को आज बाहर आने का रास्ता मिला है और बरसों बाद उसे सुनने वाला कोई साथी !!   
                                                 
याद है मुझे २५ August २००५  की शाम, जब तेज बारिश में पूरी दिल्ली जाम थी और मैं अपने site से कोई ऑटो न मिलने की वज़ह से पैदल ही आ रही थी, तेज़ बारिश के कारण Road और Gattar में कोई फ़र्क न था, सारे स्वींमिंग पुल नज़र आ रहे थे , मैं बस संभल कर चलने की कोशिश कर रही थी !
जैसे -तैसे वहाँ से निकल कर  Bus stop तक पहुँची इस आस में कि शायद यहाँ से कुछ मिल जाए मगर उस  सुनसान Bus stop पे मेरे अलावा एक ३ साल की छोटी सी बच्ची जो पहले रोआँसा बैठी थी पर अब मुझे देख रोने लगी थी ,तब मुझे क्या पता था ये कोई और नही मेरी बेटी है "माया "...... 
                                        इतना सुनते ही माया ने दोनों हाथों से अमाया का हाथ कस कर पकड़ा, अपना सिर उसकी बाजुजों पर टिका कर रोने लगी !

आज उसे अपनी की हुई बद्तमीज़ी और हर बदसुलुकि साफ - साफ नज़र आ रही थी, कैसे उसकी माँ अपनी खुशियों की परवाह न कर माँ होने का हर्ज़ाना भरती रही और हर मोड़ पर कैसे मेरे लिए अपने प्यार को साबित करती रही !
               और मैं.........  सारी ज़िंदगी उनसे प्यार नहीं...... उनके प्यार को Judge करने का रास्ता ढूँढ़ती रही !
सही कहा आज मंदना आंटी ने कि  मैं अमाया की बेटी हो ही नहीं सकती मैं  सिर्फ "माया "हूँ !!
अभी कुछ घण्टें पहले मंदना जो अमाया की friend थी, उसकी और माया के बीच हुई बहस में माया खो सी जाती है.....
                कुर्सी के ऊपर वाले हिस्से को मंदना पकड़े हुए अपने गुस्से को  Control करने की कोशिश कर रही है, तभी माया उसे पीछे से आवाज़ देती है ........ आंटी ...... आंटी 
मंदना पलटती तो है मगर अपने गुस्से और अपने हाथों को Control नहीं कर पाती और एक जोरदार थप्पड़ माया को लगाती है !
                आँखों में सवाल लिए माया गुस्से से मंदना की तरफ देखती है और कापती जुबान से कहती है...... आपकी हिम्मत...... इतना निकला ही था कि मंदना ने बीच में रोकते हुए कहा - हिम्मत...... काश ! ये हिम्मत मैंने १६ साल पहले की होती, जिस दिन अमाया ने तुम्हें सड़क से उठा कर ये घर दिया,... एक अनाथ......जिसकी कोई पहचान न थी...... जिसका अपनों से कोई वास्ता न था.......उसे माँ -बेटी का एक खूबसूरत रिश्ता दिया  !
          काश ! उस दिन उसे हिम्मत कर समझा पाती .....कि ये जिसे तू खुशियों की तिज़ोरी समझ घर लायी है, यही एक दिन तेरी ज़िंदगी का तेज़ाब बन जाएगी !
                            मंदना बेतहाशा बोले जा रही थी आज उसके बस में न उसके बोल थे और न उसके आँसू ....और माया एक कोने में चुपचाप सन्न खड़ी थी पर उसके दिमाग में........ बीती बातों के अंश चल रहे थे.... किसतरह वो अपने पिता के न होने की वजह अमाया को समझती रही...... वक़्त बे वक़्त उसके सिंगल हुड पैरेंट होने का ताना देती रही, उसके प्यार में हमेशा कमी निकालती रही ! 
उसके प्यार पर सिर्फ अपना हक़ तो समझती ही थी, पर धीरे -धीरे उसकी ज़िंदगी पर भी अपना हक़ जमा बैठी !  
                                     और आज..... उनके  Birthday पर रणविजय जी  को घर से निकाल कर, उनके शरीर का एक हिस्सा भी निकाल चूँकि थी, उनकी तरफ आ रही ख़ुशी की छोटी सी झलक से ही, मैं इतना घबरा गई.......की उनकी ज़िंदगी का बरसों का सूनापन मुझे न दिखा, उन्होंने अपने Life में प्यार को थोड़ा तवज्जों क्या दिया, मुझे लगा वो अपने फ़र्ज़ से दगा कर रही है !
                                मुझे यक़ीनन जलन हो गयी थी, कि इस उम्र में भी इतना बेवजह प्यार करने वाला इन्हें कैसे मिल सकता है, शायद यही मेरे लिए नफरत की वजह बन गई, और बरसों पहले कही बात आज सच हो गई, जिसे वो हर पराई नजरों से बचाती रही, वही आज उनकी ज़िंदगी का तेज़ाब जो बन गई !
                                                        अमाया का हाथ थामे माया,...... आँसू जो उसके थमने का नाम नहीं ले रहे थे...... आँसुओं की इतनी बारिश में भी उसके होंठ सूखे थे, बहुत कुछ कहना चाहती थी पर शुरूवात कहाँ से हो समझ नहीं आ रहा था...... कहते है न जब दिल पर गहरी चोट या धक्का लगता है तब हमारे शब्द शायरी का रूप ले लेते है !
माया -  आसमां में तारे लाखों में है !
            पर दिखते हमें हज़ारों में है !!
            अपने हर पुर्जे से बेरुख़ी बरसाया मैंने !!!
            फ़िर भी गिनती आपकी गुनाहगारों में है !!!!  
अमाया के झुके चेहरे को उठाते हुए माया कहती है....... Mom ..... अमाया की आँखें तो खुली थी पर उनमें कोई हलचल न थी ! 
माया घबराकर फिर कहती है....... Mom
रात के इस सन्नाटे में माया को कुछ टपकने की आवाज़ आती है, वो कुर्सी की दूसरी तरफ देखती है,.....नीचे उसकी माँ की  Scotch की Glass पड़ी थी, उँगलियों को रास्ता बना,....कटी हुई नस से रिसता हुआ खून Scotch की Glass में टपक रहा था और अमाया की Favorite Scotch अब Red wine में बदल गयी थी.....जो माया की Favorite Wine  थी !! 

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